Thursday, November 2, 2017

पाठ-11 जब सिनेमा ने बोलना सिखा

पाठ-11 जब सिनेमा ने बोलना सिखा


1. जब पहली बोलती फिल्म प्रदर्शित हुई तो उसके पोस्टरों पर कौन-से वाक्य छापे गए? उस फिल्म में कितने चेहरे थे? स्पष्ट कीजिए।

उत्तर:- देश की पहली बोलती फिल्म के विज्ञापन के लिए छापे गए वाक्य इस प्रकार थे –
”वे सभी सजीव हैं, साँस ले रहे हैं, शत-प्रतिशत बोल रहे हैं, अठहत्तर मुर्दा इनसान जिंदा हो गए, उनको बोलते, बातें करते देखो।”
पाठ के आधार पर ‘आलम आरा’ में कुल मिलाकर 78 चेहरे थे अर्थात् काम कर रहे थे।

2. पहला बोलता सिनेमा बनाने के लिए फिल्मकार अर्देशिर एम. ईरानी को प्रेरणा कहाँ से मिली? उन्होंने आलम आरा फिल्म के लिए आधार कहाँ से लिया?विचार व्यक्त कीजिए।
उत्तर:- फिल्मकार अर्देशिर एम. ईरानी ने 1929 में हॉलीवुड की एक बोलती फिल्म ‘शो बोट’ देखी और तभी उनके मन में बोलती फिल्म बनाने की इच्छा जगी। इस फ़िल्म का आधार उन्होंने पारसी रंगमंच के एक लोकप्रिय नाटक से लिया।

3. विट्ठल का चयन आलम आरा फिल्म के नायक के रूप हुआ लेकिन उन्हें हटाया क्यों गया? विट्ठल ने पुन: नायक होने के लिए क्या किया? विचार प्रकट कीजिए।
उत्तर:- विट्ठल को फ़िल्म से इसलिए हटाया गया कि उन्हें उर्दू बोलने में परेशानी होती थी। पुन: अपना हक पाने के लिए उन्होंने मुकदमा कर दिया। विट्ठल मुकदमा जीत गए और भारत की पहली बोलती फिल्म के नायक बनें।

4. पहली सवाक् फिल्म के निर्माता-निदेशक अर्देशिर को जब सम्मानित किया गया तब सम्मानकर्ताओ ने उनके लिए क्या कहा था? अर्देशिर ने क्या कहा?और इस प्रसंग में लेखक ने क्या टिप्पणी की है? लिखिए।
उत्तर:- पहली सवाक्‌ फिल्म के निर्माता-निर्देशक अर्देशिर को प्रदर्शन के पच्चीस वर्ष पूरे होने पर सम्मानित किया गया और उन्हें ”भारतीय सवाक्‌ फिल्मों का पिता” कहा गया तो उन्होंने उस मौके पर कहा था, – ”मुझे इतना बड़ा खिताब देने की जरूरत नहीं है। मैंने तो देश के लिए अपने हिस्से का जरूरी योगदान दिया है।” इस प्रसंग की चर्चा करते हुए लेखक ने अर्देशिर को विनम्र कहा है।

5. मूक सिनेमा में संवाद नहीं होते, उसमें दैहिक अभिनय की प्रधानता होती है। पर, जब सिनेमा बोलने लगा, उसमें अनेक परिवर्तन हुए। उन परिवर्तनों को अभिनेता, दर्शक और कुछ तकनीकी दृष्टि से पाठ का आधार लेकर खोजें, साथ ही अपनी कल्पना का भी सहयोग लें।
उत्तर:- मूक सिनेमा ने बोलना सीखा तो बहुत सारे परिवर्तन हुए। बोलती फिल्म बनने के कारण अभिनेताओं पढ़ा-लिखा होना ज़रूरी हो गया, क्योंकि अब उन्हें संवाद भी बोलने पड़ते थे। दर्शकों पर भी अभिनेताओं का प्रभाव पड़ने लगा। नायक-नायिका के लोकप्रिय होने से औरतें अभिनेत्रियों की केश सज्जा तथा उनके कपड़ों की नकल करने लगीं। दृश्य और श्रव्य माध्यम के एक ही फ़िल्म में समिश्रित हो जाने से तकनीकी दृष्टि से भी बहुत सारे परिवर्तन हुए।

6. डब फिल्में किसे कहते हैं? कभी-कभी डब फ़िल्मों में अभिनेता के मुँह खोलने और आवाज़ में अंतर आ जाता है। इसका कारण क्या हो सकता है?
उत्तर:- फिल्मों में जब अभिनेताओं को दूसरे की आवाज़ दी जाती है तो उसे डब कहते हैं।
कभी-कभी फिल्मों में आवाज़ तथा अभिनेता के मुँह खोलने में अंतर आ जाता है क्योंकि डब करने वाले और अभिनय करने वाले की बोलने की गति समान नहीं होती या किसी तकनीकी दिक्कत के कारण हो जाता है।

भाषा की बात

7. सवाक् शब्द वाक् के पहले ‘स’ लगाने से बना है। स उपसर्ग से कई शब्द बनते हैं। निम्नलिखित शब्दों के साथ ‘स’ का उपसर्ग की भाँति प्रयोग करके शब्द बनाएँ और शब्दार्थ में होनेवाले परिवर्तन को बताएँ।
हित, परिवार, विनय, चित्र, बल, सम्मान।
उत्तर:- शब्द – उपसर्ग वाले शब्द
(i) हित – सहित
(ii) परिवार – सपरिवार
(iii) विनय – सविनय
(iv) चित्र – सचित्र
(v) बल – सबल
(vi) मान – सम्मान

8. उपसर्ग और प्रत्यय दोनों ही शब्दांश होते हैं। वाक्य में इनका अकेला प्रयोग नहीं होता। इन दोनों में अंतर केवल इतना होता है कि उपसर्ग किसी भी शब्द में पहले लगता है और प्रत्यय बाद में।
हिंदी के सामान्य उपसर्ग इस प्रकार हैं – अ/अन, नि, दु, क/कु, स/सु, अध, बिन, औ आदि।
पाठ में आए उपसर्ग और प्रत्यय युक्त शब्दों के कुछ उदाहरण नीचे दिए जा रहे हैं
मूल शब्दउपसर्गप्रत्ययशब्द
वाक्सवाक्
लोचनासुसुलोचना
फिल्मकारफिल्मकार
कामयाबकामयाबी
इस प्रकार के 15-15 उदाहरण खोजकर लिखिए और अपने सहपाठियों को दिखाइए।
उत्तर:-
मूल शब्दउपसर्गनया शब्द
पुत्रसुसुपुत्र
घटऔघट
सारअनुअनुसार
मुखआमुख
परिवारसपरिवार
नायकअधिअधिनायक
मरणआमरण
संहारउपउपसंहार
ज्ञानअज्ञान
यशसुसुयश
कोणसमसमकोण
कर्मसत्सत्कर्म
रागअनुअनुराग
बंधनिनिबंध
पकाअधअधपका

मूल शब्दप्रत्ययनया शब्द
चाचाऐराचचेरा
लेखलेखक
कालापनकालापन
लड़आईलड़ाई
सजआवटसजावट
अंशत:अंशत:
सुनारइनसुनारिन
जलजलज
परजीवीपरजीवी
खुदआईखुदाई
ध्यानपूर्वकध्यानपूर्वक
चिकनाआहटचिकनाहट
विशेषतयाविशेषतया
चमकईलाचमकीला
भारतईयभारतीय

पाठ-10 कामचोर

पाठ-10 कामचोर


1. कहानी में मोटे-मोटे किस काम के हैं? किन के बारे में और क्यों कहा गया?
उत्तर:- कहानी में ‘मोटे-मोटे किस काम के हैं’ बच्चों के बारे में कहा गया है क्योंकि वे घर के कामकाज में जरा सी भी मदद नहीं करते थे तथा दिन भर उधम मचाते रहते थे। इस तरह से ये कामचोर हो गए थे।

2. बच्चों के ऊधम मचाने के कारण घर की क्या दुर्दशा हुई?
उत्तर:- बच्चों के उधम मचाने से घर अस्त-व्यस्त हो गया। मटके-सुराहियाँ इधर-उधर लुढक गए। घर के सारे बर्तन अस्त-व्यस्त हो गए। पशु-पक्षी इधर-उधर भागने लगे। घर में धूल, मिट्टी और कीचड़ का ढ़ेर लग गया। मटर की सब्जी बनने से पहले भेड़ें खा गईं। मुर्गे-मुर्गियों के कारण कपड़े गंदे हो गए। इस वजह से पारिवारिक शांति भी भंग हो गई। अम्मा ने तो घर छोड़ने का भी फैसला ले लिया।

3. “या तो बच्चाराज कायम कर लो या मुझे ही रख लो।” अम्मा ने कब कहा? और इसका परिणाम क्या हुआ?
उत्तर:- अम्मा ने बच्चों द्वारा किए गए घर के हालत को देखकर ऐसा कहा था। जब पिताजी ने बच्चों को घर के काम काज में हाथ बँटाने को कहा तब उन्होंने इसके विपरीत सारे घर को तहस-नहस कर दिया। जिससे अम्मा जी बहुत परेशान हो गई थीं। इसका परिणाम ये हुआ कि पिताजी ने घर की किसी भी चीज़ को बच्चों को हाथ ना लगाने कि हिदायत दे डाली। अगर किसी ने घर का काम किया तो उसे रात का खाना नहीं दिया जाएगा।

4. ‘कामचोर’ कहानी क्या संदेश देती है?
उत्तर:- यह एक हास्यप्रधान कहानी है। यह कहानी संदेश देती है की बच्चों को घर के कामों से अनभिज्ञ नहीं होना चाहिए। उन्हें उनके स्वभाव के अनुसार, उम्र और रूचि ध्यान में रखते हुए काम कराना चाहिए। जिससे बचपन से ही उनमें काम के प्रति लगन तथा रूचि उत्पन्न हो न कि ऊब।

5. क्या बच्चों ने उचित निर्णय लिया कि अब चाहे कुछ भी हो जाए, हिलकर पानी भी नहीं पिएँगे।
उत्तर:- बच्चों द्वारा लिया गया निर्णय उचित नहीं था क्योंकि स्वयं हिलकर पानी न पीने का निश्चय उन्हें और भी कामचोर बना देगा। वे कभी-भी कोई काम करना सीख ही नहीं पाएँगें। बच्चों को काम तो करना चाहिए पर समझदारी के साथ। बड़ों को उनको काम सिखाना चाहिए और आवश्यकता अनुसार मार्गदर्शन देना चाहिए।

6. घर के सामान्य काम हों या अपना निजी काम, प्रत्येक व्यक्ति को अपनी क्षमता के अनुरूप उन्हें करना आवश्यक क्यों है?
उत्तर:- अपनी क्षमता के अनुसार काम करना इसलिए जरूरी है क्योंकि क्षमता के अनुरूप किया गया कार्य सही और सुचारु रूप से होता है। यदि हम अपने घर का काम या अपना निजी काम, नहीं करेंगे तो हम कामचोर बन जाएँगे। हमें अपने कामों के लिए आत्मनिर्भर रहना चाहिए।

7. भरा-पूरा परिवार कैसे सुखद बन सकता है और कैसे दुखद? कामचोर कहानी के आधार पर निर्णय कीजिए।
उत्तर:- भरा-पूरा परिवार तब सुखद बन सकता है जब सब मिल-जुलकर कार्य करें व दुखद तब बनता है जब सब स्वार्थ भावना से कार्य करें। कामों के क्षमतानुसार विभाजित करने से कहानी जैसी दुखद स्थिति से बचा जा सकता है। कार्यों को बाँटने से किसी दूसरे को काम करने के लिए कहने की जरुरत होगी और तनाव भी उत्पन्न नहीं होगा।

8. बड़े होते बच्चे किस प्रकार माता-पिता के सहयोगी हो सकते हैं और किस प्रकार भार? कामचोर कहानी के आधार पर अपने विचार व्यक्त कीजिए।
उत्तर:- बडे होते बच्चे यदि माता-पिता को छोटे-मोटे कार्यों में मदद करें तो वे उनके सहयोगी हो सकते हैं जैसे अपना कार्य स्वयं, अपने-आप स्कूल के लिए तैयार हो जाएँ, अपने खाने के बर्तन यथा सम्भव स्थान पर रख आएँ, अपने कमरे को सहज कर रखें।
यदि हम बच्चों को उनका कार्य करने की सीख नहीं देते तो वह सहयोग के स्थान पर माता-पिता के लिए भार ही साबित होंगे। उनके बड़ा होने पर उनसे कोई कार्य कराया जाएगा तो वह उस कार्य को भली-भांति करने के स्थान पर तहस-नहस ही कर देंगे, जैसे की कामचोर लेख पर बच्चों ने सारे घर का हाल कर दिया था। इसलिए माता-पिता को बच्चों को उनके स्वभाव के अनुसार, उम्र और रूचि ध्यान में रखते हुए काम कराना चाहिए। जिससे बचपन से ही उनमें काम के प्रति लगन तथा रूचि उत्पन्न हो न कि ऊब। और उनके सहयोगी हो सके।

9. ‘कामचोर’ कहानी एकल परिवार की कहानी है या संयुक्त परिवार की? इन दोनों तरह के परिवारों में क्या-क्या अंतर होते हैं?
उत्तर:- कामचोर कहानी सयुंक्त परिवार की कहानी है इन दोनों में अन्तर इस प्रकार है –
एकल परिवार में सदस्यों की संख्या तीन से चार होती है – माँ, पिता व बच्चे होते है। सयुंक्त परिवार में सदस्यों की संख्या ज़्यादा होती है क्योंकि इसमें चाचा-चाची ताऊजी-ताईजी,माँ-पिताजी, बच्चे सभी सम्मिलित होते हैं। एकल परिवार में सारा कार्य स्वयं करना पड़ता है जबकि संयुक्त परिवार में सबलोग मिल-जुलकर कार्य करते हैं। एकल परिवार में जीवन के सुख-दुख का अकेले सामना करना पड़ता है जबकि सयुंक्त परिवार में सारे सदस्य मिलकर जीवन के सुख-दुख का सामना करते है।

 भाषा की बात
10. “धुली-बेधुली बालटी लेकर आठ हाथ चार थनों पर पिल पड़े।” धुली शब्द से पहले ‘बे’ लगाकर बेधुली बना है। जिसका अर्थ है ‘बिना धुली’ ‘बे’ एक उपसर्ग है।
‘बे’ उपसर्ग से बननेवाले कुछ और शब्द हैं –
बेतुका, बेईमान, बेघर, बेचैन, बेहोश आदि। आप भी नीचे लिखे उपसर्गों से बननेवाले शब्द खोजिए –
1. प्र …..
2. आ …..
3. भर …..
4. बद …..
उत्तर:- 1. प्र – प्रबल, प्रभाव, प्रयोग, प्रचलन, प्रवचन
2. आ – आमरण, आभार, आजन्म, आगत
3. भर – भरपेट, भरपूर, भरमार, भरसक
4. बद – बदसूरत, बदमिज़ाज, बदनाम, बदतर

पाठ 11- जो देखकर भी नहीं देखते

पाठ 11- जो देखकर भी नहीं देखते

   –  हेलेन केलर

निबंध से

1. ‘जिन लोगों के पास आँखें हैं, वे सचमुच बहुत कम देखते हैं’ – हेलेन केलर को ऐसा क्यों लगता था?
उत्तर: 
लोगों के पास जो चीज़ उपलब्ध होती है, उसका उपयोग वे नहीं करते इसलिए हेलेन केलर को ऐसा लगता है कि जिन लोगों के पास आँखें हैं, वे सचमुच बहुत कम देखते हैं।

2. ‘प्रकृति का जादू’ किसे कहा गया है?
उत्तर: 
प्रकृति के सौंदर्य और उनमें होने वाले दिन-प्रतिदिन बदलाव को ‘प्रकृति का जादू’ कहा गया है। 

3. ‘कुछ खास तो नहीं’- हेलेन की मित्र ने यह जवाब किस मौके पर दिया और यह सुनकर हेलेन को आश्चर्य क्यों हुआ?
उत्तर: 
एक बार हेलेन केलर की प्रिय मित्र जंगल में घूमने गई थी। जब वह वापस लौटी तो हेलेन केलर ने उससे जंगल के बारे में जानना चाहा तब उनकी मित्र ने जवाब दिया कि ‘कुछ खास तो नहीं’। यह सुनकर हेलेन को आश्चर्य इसलिए हुआ क्योंकि लोग आँखें होने के बाद भी कुछ नहीं देख पाते किन्तु वे तो आँखें न होने के बावजूद भी प्रकृति की बहुत सारी चीज़ों को केवल स्पर्श से ही महसूस कर लेती हैं। 

4. हेलेन केलर प्रकृति की किन चीज़ों को छूकर और सुनकर पहचान लेती थीं? पाठ पढ़कर इसका उत्तर लिखो।
उत्तर: 
हेलन केलर भोज-पत्र के पेड़ की चिकनी छाल और चीड की खुरदरी छाल को स्पर्श से पहचान लेती थी। वसंत के दौरान वे टहनियों में नयी कलियाँ, फूलों की पंखुडियों की मखमली सतह और उनकी घुमावदार बनावट को भी वे छूकर पहचान लेती थीं। चिडिया के मधुर स्वर को वे सुनकर जान लेती थीं। 

5. ‘जबकि इस नियामत से ज़िंदगी को खुशियों के इन्द्रधनुषी रंगों से हरा-भरा जा सकता है।’ – तुम्हारी नज़र में इसका क्या अर्थ हो सकता है? 
 
उत्तर: 
इन पंक्तियों में हेलेन केलर ने जिंदगी में आँखों के महत्व को बताया है। वह कहती हैं की आँखों के सहयोग से हम अपने जिंदगी को खुशियों के रंग-बिरंगे रंगों से रंग सकते हैं।


निबंध से आगे


1. कान से न सुनने पर आस पास की दुनिया कैसी लगती होगी? इस पर टिप्पणी लिखो और साथियों के साथ विचार करो।
उत्तर: 
कान से न सुनने पर आस पास की दुनिया एकदम शांत लगती होगी। हम दूसरों की बातों को सुन नहीं पाते। केवल चीज़ों को देखकर हम उन्हें समझने का प्रयास कर सकते हैं।

2. कई चीज़ों को छूकर ही पता चलता है, जैसे – कपड़े की चिकनाहट या खुरदरापन, पत्तियों की नसों का उभार आदि। ऐसी और चीज़ों की सूची तैयार करो जिनको छूने से उनकी खासियत का पता चलता है।
उत्तर: 
चाय की गर्माहट, बर्फ़ की ठंडक, घास की नरमी, कपडे का गीलापन

3. हम अपनी पाँचों इंद्रियों में से आँखों का इस्तेमाल सबसे ज्य़ादा करते हैं। ऐसी चीज़ों के अहसासों की तालिका बनाओ जो तुम बाकी चार इंद्रियों से महसूस करते हो – 
सुनना, चखना, सूँघना, छूना। 
उत्तर:-

सुनना – संगीत सुनना, पक्षियों की चहचाहट, पशुओं की आवाज़
चखना- तीखापन, मिठास, नमकीन
सूँघना- फूल, इत्र का सुगंध, कीचड़ का दुर्गन्ध,
छूना- गर्म, नरम, ठंडा, मुलायम


भाषा की बात

1. पाठ में स्पर्श से संबंधित कई शब्द आए हैं। नीचे ऐसे कुछ और शब्द दिए गए हैं। बताओ कि किन चीज़ों का स्पर्श ऐसा होता है – 

चिकना, चिपचिपा, मुलायम, खुरदरा, लिजलिजा, ऊबड़-खाबड़, सख्त, भुरभुरा। 
उत्तर:-

चिकना – कपडा
चिपचिपा – गोंद
मुलायम – रुई
खुरदरा – घड़ा
लिजलिजा – शहद
ऊबड़-खाबड़ – सड़क
सख्त – पत्थर
भुरभुरा – गुड़

2. अगर मुझे इन चीज़ों को छूने भर से इतनी खुशी मिलती है, तो उनकीसुंदरता देखकर तो मेरा मन मुग्ध ही हो जाएगा। 
रेखांकित संज्ञाएँ क्रमश: किसी भाव और किसी की विशेषता के बारे में बता रही हैं। ऐसी संज्ञाएँ भाववाचक कहलाती हैं। गुण और भाव के अलावा भाववाचक संज्ञाओं का संबंध किसी की दशा और किसी कार्य से भी होता है। भाववाचक संज्ञा की पहचान यह है कि इससे जुड़े शब्दों को हम सिर्फ़ महसूस कर सकते हैं, देख या छू नहीं सकते। नीचे लिखी भाववाचक संज्ञाओं को पढ़ों और समझो। इनमें से कुछ शब्द संज्ञा और कुछ क्रिया से बने हैं। उन्हें भी पहचानकर लिखो – 
मिठास, भूख, शांति, भोलापन, बुढ़ापा, घबराहट, बहाव, फुर्ती, ताजगी, क्रोध, मज़दूरी। 
उत्तर: 
क्रिया से बनी भाववाचक संज्ञा – घबराना से घबराहट, बहाना से बहाव
विशेषण से बनी भाववाचक संज्ञा – बूढ़ा से बुढ़ापा, ताजा से ताजगी, भूखा से भूख, शांत से शान्ति, मीठा से मिठास, भोला से भोलापन
जातिवाचक संज्ञा से बनी भाववाचक संज्ञा – मजदुर से मजदूरी
भाववाचक संज्ञा – क्रोध और फुर्ती शब्द भाववाचक संज्ञा शब्द है।

3. मैं अब इस तरह के उत्तरों की आदी हो चुकी हूँ। 
उस बगीचे में अमलतास, सेमल, कजरी आदि तरह-तरह के पेड़ थे। 
ऊपर लिखे वाक्यों में रेखांकित शब्द देखने में मिलते-जुलते हैं, पर उनके अर्थ भिन्न हैं। नीचे ऐसे कुछ और समरूपी शब्द दिए गए हैं। वाक्य बनाकर उनका अर्थ स्पष्ट करो – 

अवधि – अवधी, में – मैं, मेल – मैला, ओर – और, दिन – दीन, सिल – सील।

उत्तर:-

अवधि – यह पैसा दो महीने की अवधि में लौटना है।
अवधी – कवि तुलसीदास ने अवधी भाषा में कई ग्रन्थ लिखें हैं।
में – चाय में चीनी डाल दो।
मैं – मैं तुमसे दुःखी हूँ।
मेल – दोनों भाइयों में कोई मेल नही है।
मैला – यह कपड़ा मैला हो गया है।
ओर – उसकी ओर इशारा मत करो।
और – मुझे कलम और कागज़ दो।
दिन – राम चार दिनों से काम से गायब है
दीन – रामू बहुत दीन है।
सिल – सिल पर पिसे मसालों को लाओ।
सील – इस बोतल की सील तोड़ो।

पाठ 10 – झांसी की रानी

पाठ 10 – झांसी की रानी

   –  सुभद्रा कुमारी चौहान


कविता से

1. ‘किंतु कालगति चुपके-चुपके काली घटा घेर लाई’
(क) इस पंक्ति में किस घटना की ओर संकेत है?
(ख) काली घटा घिरने की बात क्यों कही गई है? 
उत्तर: 
(क) इस पंक्ति में झाँसी के राजा और रानी लक्ष्मीबाई के पति गंगाधर राव की आकस्मिक मृत्यु की ओर संकेत है।
(ख) पति गंगाधर राव की की मृत्यु से रानी लक्ष्मीबाई असमय विधवा हो गयीं। दूसरी तरफ राजा के निसंतान होने के कारण अंग्रेज़ों को झाँसी पर कब्ज़ा करने का अच्छा अवसर मिल गया। इसलिए काली घटा घिरने की बात की गयी है।
2. कविता की दूसरी पंक्ति में भारत को ‘बूढा’ कहकर और उसमें ‘नई जवानी’ आने की बात कहकर सुभद्रा कुमारी चौहान क्या बताना चाहती हैं?
उत्तर: 
भारत धीरे-धीरे अंग्रेज़ों का गुलाम बनता जा रहा था। भारतीयों में साहस नहीं बचा था कि वह अपने मातृभूमि की रक्षा कर सकें। इसलिए कवयित्री ने भारत को ‘बूढ़ा’ कहा है। परन्तु रानी लक्ष्मीबाई ने भारतीयों में अदम्य साहस का संचार किया और अंग्रेज़ों के खिलाफ उन्हें खड़ा किया, जिसे कवयित्री ने ‘नई जवानी’ के आने की बात कही है।

3. झाँसी की रानी के जीवन की कहानी अपने शब्दों में लिखो और यह भी बताओ कि उनका बचपन तुम्हारे बचपन से कैसे अलग था?
उत्तर: 
झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई के बचपन का नाम मणिकर्णिका था परन्तु लोग प्यार से इन्हें मनु कहते थे। जब यह चार वर्ष की थीं तभी इनकी माता का देहांत हो गया। बचपन में ही इन्होनें शास्त्र के साथ शस्त्र तथा घुड़सवारी सीखा। इनका विवाह झाँसी के राजा गंगाधर राव से हुआ। परन्तु जल्द ही राजा की आकस्मिक मृत्यु हो गयी। राजा की कोई संतान ना वजह से अंग्रेज़ों ने झाँसी को हड़पना चाहा परन्तु लक्ष्मीबाई ने इसके विरुद्ध आवाज़ उठाई और युद्धभूमि में वीरगति को प्राप्त हुईं।
हम बचपन में क्रिकेट और वीडियो गेम खेलना पसंद करते थे। आइसक्रीम, चॉकलेट तथा अन्य चटपटी चीज़ें खाते थे। वहीँ लक्ष्मीबाई बचपन में तलवारों से खेलना तथा अस्त्रों-शस्त्रों की शिक्षा लेती थीं।

4. वीर महिला की इस कहानी में कौन-कौन से पुरुषों के नाम आए हैं? इतिहास की कुछ अन्य वीर स्त्रियों की कहानियाँ खोजो।
उत्तर: 
इस कहानी में वीर शिवाजी, नाना धुंधूपंत, ताँतिया, चतुर अजीमुल्ला, अहमद शाह मौलवी, ठाकुर कुँवरसिंह, सैनिक अभिराम आदि अनेक वीर पुरुषों के नाम आए हैं। बेगम हज़रत महल, रानी द्रोपदी बाई, रानी चेनम्मा आदि इतिहास की वीर स्त्रियाँ हैं।

अनुमान और कल्पना

1. कविता में किस दौर की बात है? कविता से उस समय के माहौल के बारे में क्या पता चलता है?
उत्तर: 
में भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम 1857 की बात है। उस समय भारत अंग्रेज़ों की गुलामी का दंश झेल रहा था। अंग्रेज़ विभिन्न कुचक्रों द्वारा भारत में अपना साम्राज्य फैलाते जा रहे थे। इस रोकने के लिए चंद वीर आगे आये और उन्हें रोकने का भरपूर प्रयास किया हालाँकि यह सफल नहीं हो पाया परन्तु इसने भारत में आजादी के जुनून को आगे बढ़ाया।

2. सुभद्रा कुमारी चौहान लक्ष्मीबाई को ‘मर्दानी’ क्यों कहती हैं?
उत्तर:-
युद्ध जैसे कार्य मर्दों के लिए माने जाते हैं परन्तु लक्ष्मीबाई ने इसे गलत साबित करते हुए युद्धभूमि में शस्त्र उठकर अंग्रेज़ों से जमकर लोहा लिया। उन्होंने मर्दों जैसी वीरता तथा गुणों को दिखाया इसलिए सुभद्रा कुमारी चौहान लक्ष्मीबाई को ‘मर्दानी’ कहती हैं।